भारतीय शिक्षण मंडल ने विकसित की भावी शिक्षा की रूपरेखा

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भारतीय शिक्षण मंडल ने विकसित की भावी शिक्षा
की रूपरेखा
8 जुलाई, नई
दिल्ली. भारत में
4000 से
अधिक शिक्षाविदों के विचारों को संकलित कर भारतीय शिक्षण मंडल ने एक समग्र एवं
एकात्म शिक्षा के प्रारूप
‘‘भारतीय शिक्षण रूपरेखा का निर्माण किया. वर्तमान में इस पर राष्ट्रव्यापी
अभिमत संग्रह अभियान चल रहा है. यह जानकारी भारतीय शिक्षण मंडल के सह संगठन मंत्री
श्री मुकुल कानितकर ने पत्रकारों के सम्मुख प्रेस वार्ता में रखी. प्रेस वार्ता
में उनके साथ मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मोहन लाल छीपा व उपाध्यक्ष डॉ. बी.एल.
नाटीया व सांसद मनोज तिवारी उपस्थित थे.
श्री कानितकर ने बताया कि आज भारत की शिक्षा
व्यवस्था अनेक प्रकार के प्रश्नों के घेरे में खड़ी है
, हमारा युवक मंहगी से मंहगी शिक्षा
प्राप्त करके भी हताशा निराशा और बेरोजगारी से त्रस्त है
, यहां की शिक्षा जीवन के मुल्यों से दूर
हो चुकी है. भारतीय शिक्षण मंडल भारतीय पुनरुत्थान के लिये भारतीय जीवन मूल्यों से
उपजी
, भारतीय ऐतिहासिक अनुभूति से उत्पन्न, भारत हित के लिये शिक्षा व्यवस्था को
विकसित करना चाहता है. इसके लिये संगठन ने विगत वर्षों में लगभग
4 हजार शिक्षाविदों शिक्षकों एवं समाजसेवियों
को एक प्रश्नावली के माध्यम से उनके सुझावों को संकलित किया है और उसे
‘‘भारतीय शिक्षण एक रूपरेखा’’ नाम की प्रस्तावित शिक्षा नीति का
प्रारूप तैयार किया है. इस प्रारूप को पिछले दस माह से सम्पूर्ण देश में शिक्षा से
जुड़े लोगों से चर्चा हेतु प्रस्तुत किया गया है. इस ड्राफ्ट पर कार्यशालाओं
, विचार-विमर्ष, गोश्ठियों का आयोजन अभियान के रूप में
चल रहा है. प्रारूप में ही लोगों के सुझाव प्राप्त करने हेतु एक प्रष्नावली भी
संलग्न की गयी है
,
जिसके
द्वारा प्रबुद्ध लोगों के अभिमत प्राप्त हो रहे हैं. देश भर से इस संदर्भ में
महत्वपूर्ण सुझाव प्राप्त हो रहे हैं. यह कार्य अभियान के रूप में चल रहा है.
6 जुलाई से 19 जुलाई तक सम्पूर्ण देश में इस प्रारूप
पर अभिमत संग्रह करने का विशेष अभियान चल रहा है. इस अभियान में लाखों की संख्या
में अभिमत प्राप्त करने की योजना है फिर प्राप्त सुझावों के आधार पर एक परिपक्व
शिक्षा नीति को तैयार करके केन्द्र सरकार व समस्त राज्य सरकारों के समक्ष
क्रियान्वयन हेतु प्रस्तुत किया जायेगा.
इस प्रारूप में शिक्षा का उद्देष्य व्यक्ति के
मौलिक एवं शाष्वत विकास को केन्द्र में रखकर बनाया गया है. प्रारम्भिक आठ वर्षीय
शिक्षा पर विशेष बल देते हुए व्यवहारिक ज्ञान देने की संस्तुति दी गयी है.
8 वर्ष के पश्चात् छात्र को अपनी जीविका
हेतु कौशल विकास करने के लिये प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश कराने पर बल दिया गया
है. ग्रामीण क्षेत्र की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर विशेष औद्योगिक संस्थान
खोलने का सुझाव दिया है. इन संस्थानों से निकले छात्र पोलीटैक्निक में प्रवेश ले
सकें और वहां से अभियांत्रिकी महाविद्यालयों के द्वार भी उनके लिये खुले हों.
यदि कुछ छात्र आठवीं तक की प्रारम्भिक शिक्षा
के बाद सीधे कार्य में लगते हैं तो उसे प्रशिक्षु सहायक मानकर यदि वह छात्र पुनः
उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता है तो उसे एक सेतु पाठ्यक्रम के द्वारा उच्च
विद्यालयीन शिक्षा में बिना किसी कालहानि के अगली कक्षा में प्रवेश देने की
व्यवस्था सुझाई गयी है.
4 वर्षीय उच्च विद्यालयीन शिक्षा जो कक्षा 9 से कक्षा 12 तक की है उसे और व्यवहारिक बनाने पर
जोर दिया गया है. आगे की शिक्षा को ध्यान में रख कर इस कौशल का चयन किया जा सकता
है. जैसे आगे चिकित्सक बनने को इच्छुक छात्र विद्ययालयीन शिक्षा के साथ परिचारक का
कौशल प्राप्त कर ले. अन्य विषयों के चयन में भी पूर्ण लचीलापन प्रस्तावित है. शाखा
के बंधन के बिना तीन वैकल्पिक विषय चयन की सुविधा मिले ऐसा सुझाव रूपरेखा कराती है.
विश्वविद्यालय शिक्षा पूर्ण स्वायत्त हो, छात्रों को अधिक से अधिक अवसर उपलब्ध
हों
, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं में वृद्धि हो, कार्यानुभव पर बल दिया जाये जिससे
कार्यसंस्कृति को बढ़ावा मिले. श्रेणी सुधार की सुविधा देते हुए हर स्तर पर उपाधि
की व्यवस्था की जाये. स्नातक स्तर से ही अनुसंधान एवं पत्र लेखन पर वरीयता दी जानी
चाहिये. लचीली व्यवस्था को उच्चतर स्तर पर भी जारी रखते हुए प्रवेश तथा निकास की
सहज सुविधा का प्रावधान रखा गया है. पहले वर्ष की शिक्षा के बाद प्रमाणपत्र
, दूसरे के बाद पदविका (डिप्लोमा), तथा तीसरे के बाद सामान्य स्नातक (पास
डिग्री) तथा चार वर्ष के बाद सम्मान स्नातक (आॅनर्स डिग्री) प्रदान की जाये. इस
दौरान बीच में शिक्षा छोड़ने को मजबूर छात्रों की कोई हानि नहीं होगी और आगे पुनः
शिक्षा प्रारम्भ करने की सुविधा रहेगी. व्यवसायिक शिक्षा में व्यवहारिक प्रवीणता
पर बल देते हुए प्रत्येक छात्र को प्रतिदिन
2 घण्टे नियमित कार्य करना अनिवार्य हो. मुख्य प्रशिक्षण अनुभव से
दिया जाना चाहिये.
मूल्यांकन एवं परीक्षा पद्धति में व्यापक सुधार
सुझाते हुए कहा गया है कि कक्षा
12 में कोई परीक्षा नहीं होगी, कक्षा 34 में मौखिक परीक्षा, कक्षा 56 में लिखित परीक्षा व कक्षा 78 में प्रायोगिक परीक्षा ली जाये. कक्षा 910 में आंतरिक मूल्यांकन मासिक परीक्षा व वार्शिक परीक्षा ली जाये.
आंतरिक परीक्षा व मासिक परीक्षा में
40-60 का अनुपात रहे. आंतरिक मूल्यांकन का आधार कक्षाकार्य, गृहकार्य, व्यावहारिक ज्ञान व कार्यानुभव को
बनाया जाये. उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण के संकेत समाप्त कर पचास प्रतिशत तक अंक पाने
वाले को अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाये
, परीक्षाफल सुधार की सुविधा हो. मूल्यांकन व परीक्षा पद्धति को क्रमशः
लागू किया जाना चाहिये.
पत्रकारों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए श्री
कानितकर ने बताया कि सम्पूर्ण शिक्षा तन्त्र के नियंत्रण हेतु एक पूर्ण स्वायत्त
आयोग बनाकर इसके नियमन का कार्य किया जाये. राज्य स्तर पर भी आयोग बनाकर उसकी
इकाइयों की स्थापना सभी जिलों में की जाये. इस आयोग में
60 से 75 प्रतिशत सदस्य शिक्षा क्षेत्र से हों और 40 से 25 प्रतिशत सदस्य समाज जीवन के भिन्न प्रतिनिधि यथा उद्योजक, समाजसेवी, शिक्षक संघ प्रतिनिधि, संस्था चालक प्रतिनिधि, शासन के प्रतिनिधि सम्मिलित हों. यह
स्वायत्त आयोग पाठ्यक्रम
, परीक्षा, शिक्षक
कल्याण
, नियुक्ति, समितियों का निर्माण तथा शिक्षण
संस्थाओं के नियमों अधिनियमों का निर्माण संचालन भी करेगा.
इसके अतिरिक्त उन्होंने बताया कि इस प्रस्तावित
प्रारूप में यह भी प्रावधान किया गया है कि प्रत्येक
4-5 वर्ष पश्चात् इस व्यवस्था के विषय में
समाज से फीडबैक लेने हेतु सर्वेक्षण कार्य भी होना चाहिये
, सर्वेक्षण के आधार पर प्राप्त सुझावों
को क्रियान्वयन हेतु जोड़ते रहना चाहिये. यह प्रक्रिया क्रमशः चलाई जाये और इस बात
का विशेष ध्यान रखा जाये कि शिक्षकों की सेवा पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
तकनीक का प्रयोग करते हुए पारदर्शिता लाई जाये. यह बातें प्रस्तावित प्रारूप में
विस्तार से दी गयी हैं
, 6
जुलाई से
19 जुलाई तक सम्पूर्ण देश में व्यापक
अभियान चलाकर इस प्रारूप पर प्रतिक्रिया व सुझाव लिये जायेंगे. उन्होंने सभी से
आह्वान किया कि इस अभियान में अपना सहयोग करें.

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