
जन्म 19.9.1927 को तमिळनाडु जिला मयिलाडुतुरै के सीरकाली में।
20 वर्ष की आयु में, भारत और पाकिस्तान का विभाजन देखकर वे स्तब्ध रह गए। पाकिस्तान से शरणार्थी के रूप में चेन्नई के आवडी में आए हिंदुओं के क्रूर अनुभवों को सुनकर, उन्होंने निश्चय किया कि मेरा यह जीवन इस देश और इस समुदाय के लिए है।
1948 में, उन्होंने बिजली क्षेत्र की अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और 73 वर्षों से जिस आदर्श को उन्होंने अपनाया था, उसके लिए अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समर्पित कर दिया।
1964 से 1980 तक वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता रहे और 1980 से 2020 तक वे हिंदू मुन्नणी के कार्यकर्ता रहे।
अपने पूरे जीवन में उन्होंने इसके लिए लाखों कार्यकर्ता तैयार किए।
कन्याकुमारी में विवेकानंद स्मारक बनाने और उस महान कार्य में लगने के लिए उन्होंने कई लोगों को सरकारी नौकरियों से त्यागपत्र देने के लिए प्रेरित किया।
विवेकानंद के विचारों को पूरे तमिलनाडु में पहुँचाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी।
उन्होंने तमिल साहित्य में विद्यमान राष्ट्रीय इतिहास और हिंदू इतिहास को तमिल जगत के सामने उजागर किया।
उन्होंने तमिलनाडु के उन युवाओं को, जो गुलामी का इतिहास ही पढ़ रहे थे, छत्रपति शिवाजी का इतिहास, राष्ट्र के लिए जीने वालों का इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं का इतिहास पढ़ाया।
उन्होंने विद्यार्थियों के भावी जीवन को सुदृढ़ बनाने के लिए “ज्ञानमलर” नामक 100 लेखो का संग्रह रूप पुस्तक लिखी।
उन्होंने प्रत्येक कार्यकर्ता को कुशलतापूर्वक और उचित ढंग से कार्य करने के लिए “ऊज़ियर तुणैवन” नामक पुस्तक लिखी।
1980 में हिंदू मुन्नणी की जिम्मेदारी संभालने के बाद, उन्होंने सबसे पहले वेल्लोर के जलकंडेश्वर मंदिर में, जहाँ 400 साल से कोई विग्रह नहीं था, एक की स्थापना करवाई।
उन्होंने पूरे तमिलनाडु में हिंदू एकता सम्मेलन आयोजित किए और हिंदुओं में आशा का संचार किया।
उन्होंने मीनाक्षीपुरम धर्मांतरण से लेकर कई धर्मांतरण रोके।
उन्होंने तिरुवारूर रथ यात्रा का संचालन करवाया, जो कई वर्षों से बंद पड़ा था।
वे संतों को झुग्गी-झोपड़ियों में ले गए।
उन्होंने हर आम हिंदू को हिंदू समुदाय के लिए लड़ने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने महिलाओं को एकजुट किया और हिंदू जागरूकता पैदा की।
उन्होंने 1975 के आपात काल के दौरान लड़ाई लड़ी,
जिसने कई लोगों को लड़ने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने आपात काल संगर्ष इतिहास संकलित किया।
उन्होंने तमिलनाडु में डि.के. के झूठे प्रचार को परास्त किया।
उन्होंने लोगों और सरकार को राष्ट्र-विरोधी, अलगाववादी आतंकवादी गतिविधियों की पहचान कराई।
उन्होंने मंदिरों और मंदिर की संपत्तियों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
उन्होंने तमिलनाडु में राष्ट्रवाद और
दैवीयता को फिर से फलने-फूलने के लिए
73 वर्षों तक लगातार तमिलनाडु की प्रवास की।
30 सितंबर, 2020 को, वे भारत माता और भगवान के चरणों में विलीन हो गए।
उनका जीवन, जो राष्ट्रवाद और दिव्यता का मिश्रण है, न केवल हम सभी के लिए, बल्कि भावी हिंदू समाज के लिए भी प्रेरणादायी रहेगा।
सप्रेम,
भक्तन
( हिन्दु मुन्नणि के दक्षिण क्षेत्र संघटन मंत्री)
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